Thursday, May 31, 2012

मैंने यूँ ही आवाज लगा दी थी तुम्हे जरुरत कहाँ थी आने की..
शिद्दतों ने पाली थी दुश्वारियां, ये हकीकत थी मेरे अफसाने की...

मस्तमौला !आज फिर इसी दर पर सांझ गुजर दी है तुमने...
रात ढल ही जाएगी तो फिर जरुरत क्या पड़ेगी किसी बहाने की...

जो झींगुरों के शोर, हवाओं की हलचल, कानों की सनसनाहट है बस...
मेरी तस्वीर पर चितेरा उकेर गया है सर्द खामोशियाँ ज़माने की...

मेरे मुरतो सरापे से वक़्त का हुनर मालूम नहीं कर पाओगे...
जवाब ही गर चाहिए हिम्मत कर लो मेरी शाइस्तगी आजमाने की...

यूँ भी मोहब्बत की कोई जात धरम ईमान रब मजहब तो होता नहीं
जाने क्यूँ अब उतना नहीं चुंधिया पाती है रेशमी डोर तेरे ताने बाने की..

जाने कैसी ये तस्वीर है जिसपे हर मौसम का मिजाज रंगीन है..
ओह.. मेरी आँखों में कतरे हैं, इनकी तो आदत है झिलमिलाने की..

अपनी साँसों का वजन संभालना हमे भी सिखा ही देगी जिंदगी...
बियाबान जंगल में तुमने कभी जुर्रत की है गुनगुनाने की..?

Friday, April 27, 2012

पाने को तेरी लम्स -ए-तन्हाई 
बेच दी हमने अपने होठों की रुबाई
कुर्बत बस रंग रौशनी ज़ाल हसीन 
जिंदगी है जबतक जिन्दा है जुदाई

बिजलियाँ तक़दीर की उफ्फ़ ज़ालिम
अश्क के जिम्मे अब हाथों की रुखाई 
गमजदा आँखें मौत खंज़र खारा पानी 
हसरते इनायत तेरे पाँव फटी बिवाई 








Wednesday, April 25, 2012

न फ़लक को गिला कोई न दरिया में कोई उफ़ान है ..!!
ऐ सुकूँ तेरे न होने का अब  रात को न कोई मलाल  है....!!
वो शय जिंदगी जो शफ्फाक पहलु में शराब ढा रही थी ..
हवासों को कब भनक  थी धनक  शीशे में रुसवाइयों के बाल हैं..!!

Monday, November 28, 2011

१.
तुम्हारी यादों को अपनी
चुन्नी का
सफ़ेद कफ़न ओढा रखा था...
आज फिर उसीको-
ओढ़नी बनाये 
घूम रही हूँ..
बाजार से कुछ चीजें 
खरीदनी बाकी रह गयी थीं...


२. 
अच्छा हो कि आज साकी तू बन जाये रकीब
देख तो..
तलब के होंठों पर थूक
वैसे ही सूख जाती है जैसे 
चीनी के समंदर में 
मोहब्बत के गुलाब...!!!

३.
हाथों के कटोरे में थोड़ी सी रौशनी छिप के
आई मेरे दर तक
दिए को टिमटिमाते देखकर
कूद गयी वो भी चारदीवारी से बाहर..
बित्ते भर जमीन पे कड़ी हूँ..
मौत को फुसलाकर ..
चार गज जमी पाना आसन कब था-

४.
हिम्मत को बुन रही हूँ हकीकत के ऊन से
पैबंद लगाने को थोडा उजाला चाहिए
मै रातों में जुगनुओं को पकड़ खेल लेती हूँ भोर होने तक
सर्द रातों की बारिश सा सर्द कुछ टूटता जा रहा भीतर
चुपचाप
बेआवाज सा ...
ताश के पत्ते-
बेगम और गुलाम
भींग हुए भी रंगीन से है...

५.
खामोशी ने आशिकी से पूछा
ऐ रंग तू इतना बेनूर क्यूँ है -
सपनों की तह लगाकर
'बस लौटी हूँ अभी अभी
रातों की परते  गिनती रही मै सारी रात
और सहेज रही हूँ 
अपनी परछाइयों की 
सलवटें..!!


रात की रानी के सुगंध सी
जिंदगी..
थोड़ी हलचल थोड़ी मंद सी 

पलकों क पीछे के संसार सी 
जिंदगी
अलमस्त भोर के बहार सी 

निर्झर कलकल सुर नाद सी 
जिंदगी
मुश्किल लम्हों के बाद सी 

परछाइयों से उठते आवाज़ सी 
जिंदगी 
नर्म पंख के पहली परवाज़ सी

गुनगुनाती चुप्पियों के राज सी
जिंदगी 
जिजीविषा के अद्भुत साज़ सी 




Thursday, September 22, 2011

तन्हाईयों का हुश्न तेरी यादें बेतरतीब बढ़ा देती हैं..
क्या जरुरी है कि बेकरारियों से चाहत पनाह मांगे ..



Friday, September 16, 2011

एक नयी सी ख्वाहिश जन्मी है..
कि चाहत ख्वाब हों
और जिंदगी शराब..

वक़्त की गोटियाँ
मुठी में रगड़कर फेंकते रहे
सपनों के तालाब में
और सूख सूखकर आम के 
पत्ते परिंदों की नर्म सेज बनते रहें..

मेरी आवारगी को बदकिरदार न कर तू..
देख तो
रेत के महल में भी
किरदार के 
दर्पण लगा रखे हैं मैंने..

अहा ..!!
तेरे होठों पे तरन्नुम हैं..
आँखों के शबनम को बता दे न..
इस हवेली का चोर दरवाजा..

अब तो बस पतंगों की डोर खींचे हम
और जिंदगी उनकी परवाज भरती रहे
ऐ शख्स
वो मेरी नफ़रत नहीं..
प्यार का मंझा था..  
हम जानते थे तुम पूछोगे-
कि बादलों के पार जाने का हुनर क्या हैं

अच्छा हो कि आज साकी तू बन जाये रकीब
देख तो..
तलब के होंठों पर थूक
वैसे ही सूख जाती है जैसे 
चीनी के समंदर में 
मोहब्बत के गुलाब...!!!

Thursday, December 23, 2010

तेरे तसव्वुर को कुछ ऐसे अंदाज में बयां करते हैं हम..
तबस्सुम जी-जान से लुटाया तब भी जब आँखें थी नम..